TMC Crisis : पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारे से निकलकर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंची तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अंदरूनी कलह अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों मिली करारी शिकस्त के बाद से ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी के भीतर असंतोष की चिंगारी सुलग रही थी, जो अब एक भीषण राजनीतिक दावानल का रूप ले चुकी है। संसद के दोनों सदनों में कभी 40 सांसदों के साथ विपक्ष की अग्रिम पंक्ति में दहाड़ने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने इतिहास के सबसे बड़े 'अस्तित्व के संकट' (existential crisis) से जूझ रही है। पार्टी को पूरी तरह बिखरने और दो फाड़ होने से बचाने के लिए अब खुद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Lok Sabha Speaker Om Birla) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा कदम उठाया है।
इस गहराते राजनीतिक संकट के बीच, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) को एक विशेष बैठक के लिए दिल्ली तलब किया है। स्पीकर ने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को आगामी 19 जून को मुलाकात का समय दिया है। इस बेहद संवेदनशील बैठक का मुख्य उद्देश्य यह है कि अभिषेक बनर्जी संसद के भीतर और बाहर पार्टी में मचे इस बगावती घमासान पर अपना पक्ष मजबूती से रखें और वर्तमान राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह साफ करें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओम बिरला द्वारा दिया गया यह मौका ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के लिए अपनी डूबती नैया को पार लगाने का आखिरी और सबसे बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
TMC Crisis की इस पूरी पटकथा में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने अचानक पूर्वोत्तर की एक बेहद छोटी और गुमनाम राजनीतिक पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में अपने गुट के विलय का औपचारिक ऐलान कर दिया। आपको बता दें कि यह दल त्रिपुरा का एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त दल (unrecognized party) है, जिसका गठन साल 2022 में हुआ था। इस पार्टी का जनाधार इतना सीमित है कि साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसने केवल दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, और उन दोनों ही प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई थी। टीएमसी जैसी राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव रखने वाली पार्टी के सांसदों का ऐसी छोटी पार्टी में विलय का फैसला यह साफ दिखाता है कि बगावत करने वाले नेता किसी भी कीमत पर दल-बदल कानून (anti-defection law) की कार्रवाई से बचना चाहते हैं।
इस बगावत की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा में ममता बनर्जी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए त्रिपुरा की इस पार्टी में विलय का रास्ता चुना है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पर्दे के पीछे की कहानी भी अब सामने आने लगी है। बागी टीएमसी सांसदों के इस गुट का नेतृत्व दिग्गज नेता शताब्दी रॉय (Satabdi Roy) कर रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात का समय मांगने से ठीक पहले शताब्दी रॉय की अगुआई में इन तमाम बागी सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और पश्चिम बंगाल में भाजपा के चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव (Bhupender Yadav) से एक गोपनीय मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद से ही देश के सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि इस पूरी बगावत की कमान कहीं न कहीं परोक्ष रूप से भाजपा के हाथों में है, जो बंगाल फतह के बाद अब संसद में भी ममता को कमजोर करना चाहती है।
यह संकट केवल लोकसभा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राज्यसभा में भी ममता बनर्जी का किला ढहता हुआ नजर आ रहा है। बीते गुरुवार को ही पार्टी के दो प्रमुख राज्यसभा सांसदों-प्रकाश चिक बराइक और कोयल मल्लिक-ने उच्च सदन की सदस्यता से अचानक इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं है। इनसे ठीक पहले तृणमूल के बेहद वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय और असम व बंगाल की राजनीति में सक्रिय महिला चेहरा सुष्मिता देव (Sushmita Dev) ने भी सांसद पद से अपना त्याग पत्र सौंप दिया था।
त्याग पत्र देने के बाद सुखेंदु शेखर रॉय ने तृणमूल कांग्रेस की कार्यशैली और नेतृत्व पर बेहद गंभीर और तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने खुलकर कहा कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (RG Kar Hospital Case) में हुए जघन्य दुष्कर्म और हत्या मामले के बाद ही उन्होंने ममता बनर्जी की पार्टी का साथ छोड़ने का पूरा मन बना लिया था क्योंकि पार्टी का रुख इस मामले में निराशाजनक था। दूसरी तरफ, सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा देने के बाद अब तृणमूल के केंद्रीय नेतृत्व से दूरी बनाते हुए अपने गृह राज्य असम की क्षेत्रीय राजनीति पर ही पूरा ध्यान केंद्रित करने की बात कही है।
अब पूरी देश की नजरें 19 जून को होने वाली इस हाई-प्रोफाइल बैठक पर टिकी हुई हैं। अभिषेक बनर्जी के सामने न केवल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने तकनीकी और कानूनी रूप से अपनी पार्टी का पक्ष रखने की चुनौती होगी, बल्कि उन्हें यह भी साबित करना होगा कि उनकी पार्टी के भीतर लोकतंत्र अब भी जीवित है। अगर अभिषेक इस बैठक में बागी सांसदों को अयोग्य घोषित कराने या दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई कराने में नाकाम रहते हैं, तो टीएमसी का दो फाड़ होना बिल्कुल तय माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के लिए यह TMC Crisis उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन और अग्निपरीक्षा वाली घड़ी बन चुका है।
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