नई दिल्ली: देश में नफरती भाषणों यानी 'हेट स्पीच' पर लगाम कसने के लिए नए दिशा-निर्देशों की मांग कर रहे याचिकाकर्ताओं को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ा संदेश मिला है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि हेट स्पीच जैसी बुराई से लड़ने के लिए भारत का वर्तमान कानूनी ढांचा पूरी तरह सक्षम है। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में नई गाइडलाइंस जारी करने से स्पष्ट मना कर दिया।
सुनवाई के दौरान बेंच ने संवैधानिक मर्यादाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि सजा तय करना और नए अपराधों को परिभाषित करना विधायिका (संसद और विधानसभा) का काम है। कोर्ट ने कहा, "हम मौलिक अधिकारों के रक्षक हैं और कानून की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन हम संसद को नया कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।" जजों ने दो टूक शब्दों में कहा कि अदालतों का काम सुधार की जरूरत की ओर इशारा करना है, न कि विधायी शक्तियों का इस्तेमाल करना।
यह फैसला उन याचिकाओं के समूह पर आया है जो साल 2020 से लंबित थीं। इनमें कोरोना काल के दौरान 'कोरोना जिहाद' जैसे नैरेटिव और विभिन्न धार्मिक सभाओं में दिए गए भड़काऊ बयानों का हवाला देते हुए कोर्ट से दखल की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मौजूदा कानून हेट स्पीच को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि समस्या कानून की कमी की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर इसके प्रभावी कार्यान्वयन (Implementation) की है।
अदालत ने नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करते हुए यह दोहराया कि यदि कोई गंभीर या संज्ञेय अपराध संज्ञान में आता है, तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस मामला दर्ज करने में आनाकानी करती है, तो पीड़ित के पास तीन मुख्य विकल्प मौजूद हैं, जिनमें सबसे पहले संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) से शिकायत करना, उसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष गुहार लगाना या फिर निजी शिकायत (Private Complaint) के माध्यम से कानूनी कार्यवाही शुरू करना शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए रास्ता खुला रखा है। कोर्ट ने कहा कि सरकारें 2017 की लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट में दिए गए सुझावों के आधार पर बदलाव करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह रिपोर्ट विशेष रूप से हेट स्पीच से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता में नए प्रावधान जोड़ने की वकालत करती है।
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