मुंबई: बुधवार को महाराष्ट्र सरकार ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के दौरान ‘महाराष्ट्र राज्य कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) नीति 2026’ को मंजूरी दे दी। इस नीति को कचरा प्रबंधन में सुधार करने और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस नीति का लक्ष्य शहरी कचरे और कृषि अवशेषों की बढ़ती समस्या का समाधान करना है और उन्हें स्वच्छ तथा नवीकरणीय ईंधन में बदलने की प्रक्रिया को आसान बनाना है।
वर्तमान में, महाराष्ट्र के 423 शहरी स्थानीय निकायों में प्रतिदिन लगभग 24,500 मीट्रिक टन नगरपालिका ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इस कचरे का एक बड़ा हिस्सा जैविक प्रकृति का होता है; हालांकि, वर्तमान में इसका बहुत छोटा हिस्सा ही खाद या बायोगैस में बदला जाता है। इसके कारण लैंडफिल स्थलों पर प्रदूषण और भूजल के दूषित होने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं। इसके अलावा, राज्य के भीतर प्रतिवर्ष 20 मिलियन टन से अधिक कृषि अवशेष या तो जला दिए जाते हैं या फिर बेकार चले जाते हैं। नई नीति का उद्देश्य इस समस्या को कम करना है और इसमें कचरे को दो श्रेणियों जैविक और अजैविक में अलग-अलग करने को अनिवार्य बनाया गया है।
इस नीति के मुख्य उद्देश्यों में CBG उत्पादन को बढ़ावा देना शामिल है, जो औद्योगिक, परिवहन और घरेलू जरूरतों को पूरा करेगा। साथ ही इसका उद्देश्य 2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन (net-zero carbon emissions) हासिल करने के भारत के लक्ष्य में योगदान देना, जैव-ऊर्जा क्षेत्र में निवेश, रोज़गार और उद्यमिता को बढ़ावा देना, और मराठवाड़ा क्षेत्र में बंजर तथा आर्द्रभूमि पर नेपियर घास की खेती को प्रोत्साहित करना है, ताकि मीथेन गैस का उत्पादन अधिकतम किया जा सके।
इन परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए, प्रत्येक CBG संयंत्र को प्रतिदिन न्यूनतम 200 टन जैविक कचरे की आवश्यकता होगी। किसान उत्पादक संगठन (FPOs) गन्ने के अवशेष, सोयाबीन का कचरा और पशुओं के गोबर जैसे कच्चे माल की आपूर्ति करेंगे। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, एक समर्पित वेब पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किया जाएगा, जो किसानों, कचरा इकट्ठा करने वालों और परियोजना डेवलपर्स के बीच एक जोड़ने वाले मंच के रूप में कार्य करेगा।
सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026–27 के लिए ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ (Viability Gap Funding) के तहत 500 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्ताव रखा है। परियोजनाएं अपनी क्षमता के आधार पर अधिकतम 10 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी प्राप्त करने की पात्र होंगी। ये परियोजनाएं सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership) के तहत लागू की जाएंगी। स्थानीय निकाय प्रति टन कचरे के लिए 'टिपिंग शुल्क' का भुगतान करेंगे और राज्य सरकार बिजली तथा पानी की आपूर्ति के मामले में इन इकाइयों को प्राथमिकता भी देगी।
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