Delhi High Court Kejriwal Case: केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से रोकने की बड़ी साजिश नाकाम!

खबर सार :-
Delhi High Court Kejriwal Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाते हुए कानून का पाठ पढ़ाया। जानिए अदालत में क्या-क्या हुआ।

Delhi High Court Kejriwal Case: केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से रोकने की बड़ी साजिश नाकाम!
खबर विस्तार : -

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के सियासी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी कानूनी खबर सामने आ रही है। दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने आम आदमी पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ दायर की गई एक बेहद संवेदनशील और बड़ी याचिका को पूरी तरह से कूड़ेदान में डाल दिया है। अदालत ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और वरिष्ठ नेता दुर्गेश पाठक को आगामी चुनाव लड़ने से अयोग्य (Disqualified) ठहराने की मांग करने वाली याचिका को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के खेमे ने जहां बड़ी राहत की सांस ली है, वहीं याचिकाकर्ता को अदालत के भीतर ही तीखे सवालों का सामना करना पड़ा।

यह पूरा मामला मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के सामने सूचीबद्ध था। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया और साफ कर दिया कि न्यायपालिका का इस्तेमाल राजनीतिक हिसाब-किताब चुकता करने के लिए या किसी को जबरन चुनावी दौड़ से बाहर करने के लिए नहीं किया जा सकता। Delhi High Court Kejriwal Case की इस सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में जबरदस्त बहस देखने को मिली।

 क्या था पूरा विवाद और क्यों उठी अयोग्य ठहराने की मांग?

यह पूरी कानूनी लड़ाई सतीश कुमार अग्रवाल नाम के एक शख्स द्वारा दायर याचिका से शुरू हुई थी। याचिकाकर्ता ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधित्व कानून की दुहाई देते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) के तीनों कद्दावर नेताओं—अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। याचिका में दावा किया गया था कि दिल्ली आबकारी नीति मामले (Delhi Excise Policy Case) में निचली अदालत से मिली जमानत के खिलाफ जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने उच्च न्यायालय का रुख किया, तब इन तीनों नेताओं का रवैया न्यायपालिका के प्रति ठीक नहीं था।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की पीठ के समक्ष जब इस मामले की महत्वपूर्ण सुनवाई चल रही थी, तब इन नेताओं ने जानबूझकर उस न्यायिक प्रक्रिया और सुनवाई में हिस्सा लेने से पूरी तरह इंकार कर दिया। याचिका में तर्क दिया गया था कि देश की एक सम्मानित अदालत की कार्यवाही का इस तरह बहिष्कार करना सीधे तौर पर जस्टिस शर्मा की छवि को धूमिल करने और न्यायपालिका को बदनाम करने की एक सोची-समझी कोशिश थी। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि जो लोग देश के संविधान और अदालत का सम्मान नहीं करते, उन्हें चुनाव लड़ने का कोई नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं होना चाहिए और चुनाव आयोग को इन्हें अयोग्य घोषित कर देना चाहिए।

 जब जज साहब ने वकील को कानून की किताब खोलकर समझाया

जैसे ही इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से सीधे और तीखे सवाल पूछने शुरू कर दिए। कोर्ट के तेवरों से साफ था कि वह इस तरह की याचिकाओं को लेकर बिल्कुल भी नरम रुख अपनाने के मूड में नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील की तरफ देखते हुए पूछा, "आप वास्तव में इस अदालत से क्या उम्मीद कर रहे हैं? क्या आप चाहते हैं कि हम देश के निर्वाचन आयोग (Election Commission) को यह निर्देश जारी कर दें कि वह आम आदमी पार्टी की एक राजनीतिक दल (Political Party) के रूप में मान्यता ही हमेशा के लिए खत्म कर दे? क्या आपके पास कोई ऐसा कानून या प्रावधान है जो इसकी इजाजत देता हो?"

इस सीधे सवाल पर याचिकाकर्ता के वकील थोड़े असहज नजर आए। उन्होंने अदालत को जवाब देते हुए कहा कि मौजूदा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) में सीधे तौर पर ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान तो नहीं है, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत यानी उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने अपने पूर्व के एक फैसले में तीन ऐसी असाधारण और अपवादस्वरूप स्थितियों का जिक्र किया है, जिनके तहत किसी भी राजनीतिक दल की मान्यता को रद्द या समाप्त किया जा सकता है।

 तीन स्थितियां और कोर्ट का करारा तमाचा

वकील के इस तर्क को सुनते ही दिल्ली उच्च न्यायालय की बेंच ने मामले की तह में जाते हुए उन तीनों स्थितियों का विश्लेषण खुद ही कर डाला। कोर्ट ने बहुत ही स्पष्ट लहजे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई पहली दो स्थितियां तो इस मामले पर किसी भी कोण से लागू ही नहीं होती हैं। अब बची तीसरी स्थिति, तो वह तब पैदा होती है जब किसी राजनीतिक दल को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) या देश के किसी अन्य गंभीर कानून के तहत पूरी तरह से बैन या गैरकानूनी घोषित कर दिया गया हो। केवल उसी अत्यंत गंभीर और तीसरे हालात में ही किसी दल की मान्यता छीनी जा सकती है।

इसके बाद कोर्ट ने वकील की तरफ देखते हुए पूछा, "क्या आम आदमी पार्टी इस वक्त देश में किसी भी तरह से इस तीसरी श्रेणी के अंतर्गत आती है? क्या उसे गैरकानूनी घोषित किया गया है?" इस पर याचिकाकर्ता के वकील के पास 'ना' कहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने बेहद दबी आवाज में स्वीकार किया कि नहीं, ऐसा नहीं है।

 अवमानना का कानून अलग है, चुनाव से इसे मत जोड़िए

इसके बाद भी जब याचिकाकर्ता के वकील ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के पिछले फैसले और टिप्पणियों को अपना मुख्य आधार बनाने की कोशिश की, तो कोर्ट ने उन्हें दोबारा टोकते हुए कहा कि पहले आप कानूनी तौर पर यह साबित करके दिखाइए कि क्या किसी भी अदालत के एक सामान्य आदेश के बाद चुनाव आयोग को किसी दल की मान्यता छीनने का अधिकार मिल जाता है?

वकील ने अपनी आखिरी कोशिश के तौर पर भावुक कार्ड खेलते हुए कहा कि अगर देश के इन बड़े नेताओं को भारतीय संविधान (Indian Constitution) और हमारी न्याय व्यवस्था में भरोसा ही नहीं है, तो फिर इन्हें जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? इन्होंने सरेआम न्यायपालिका को नीचा दिखाने का काम किया है।

इस दलील को खारिज करते हुए खंडपीठ ने न्यायशास्त्र का सबसे बड़ा सिद्धांत सामने रख दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर दुनिया का कोई भी व्यक्ति या राजनेता देश की न्यायपालिका को बदनाम करने, उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने या उसका अपमान करने की कोशिश करता है, तो उसके लिए हमारे देश में 'कोर्ट की अवमानना' (Contempt of Court) का एक बेहद कड़ा और विशेष कानून पहले से मौजूद है। अदालतें उससे निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। कोर्ट ने आगे पूछा कि मान लीजिए अगर कोई व्यक्ति अवमानना का दोषी साबित हो भी जाता है, तो क्या देश के मौजूदा कानून के तहत वह सीधे चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है?

जब याचिकाकर्ता के वकील ने इस पर भी गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि जो कोई भी संविधान विरोधी ताकतों या गतिविधियों में लिप्त पाया जाए, उसके खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाया जाना चाहिए, तब कोर्ट ने समझ लिया कि इस याचिका में कोई भी ठोस कानूनी आधार नहीं है। यह सिर्फ राजनीतिक सुर्खियां बटोरने का एक जरिया मात्र है। कोर्ट ने बिना वक्त गंवाए आदेश जारी करते हुए इस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। Delhi High Court Kejriwal Case में आया यह फैसला यह साबित करता है कि अदालतों को राजनीतिक अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता।

अन्य प्रमुख खबरें