'हर बार नहीं मिल सकती नरमी की छूट', कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद की अंतरिम जमानत अर्जी पर सुनाया सख्त फैसला

खबर सार :-
Delhi riots conspiracy: दिल्ली दंगा साजिश (Delhi riots conspiracy) मामले में जेल में बंद उमर खालिद को बड़ा झटका लगा है। कड़कड़डूमा कोर्ट ने मां की सर्जरी और मामा के चेहलुम के नाम पर मांगी गई 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका को सख्त टिप्पणियों के साथ खारिज कर दिया है। जानिए कोर्ट रूम में क्या हुआ।

'हर बार नहीं मिल सकती नरमी की छूट', कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद की अंतरिम जमानत अर्जी पर सुनाया सख्त फैसला
खबर विस्तार : -

नई दिल्ली: साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली को झकझोर देने वाले भीषण सांप्रदायिक दंगों की कथित बड़ी साजिश (Delhi riots conspiracy) के मामले में सलाखों के पीछे बंद जेएनयू (JNU) के पूर्व छात्र उमर खालिद को देश की देश की एक बड़ी अदालत से बहुत बड़ा झटका लगा है। राजधानी दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद की उस अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने मानवीय आधारों का हवाला देते हुए महज 15 दिनों के लिए जेल से बाहर आने यानी अंतरिम जमानत (interim bail) की गुहार लगाई थी। अदालत ने साफ कर दिया कि हर बार एक ही तरह के या कमजोर आधारों पर किसी भी आरोपी को जेल से बाहर आने की खुली छूट नहीं दी जा सकती। इस फैसले के बाद अब उमर खालिद की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं।

 उमर खालिद ने जेल से बाहर आने के लिए चली थी कौन सी चाल?

कड़कड़डूमा अदालत के सामने उमर खालिद की तरफ से पैरवी कर रहे वकीलों ने बेहद भावुक दलीलें पेश की थीं। याचिका में कहा गया था कि उमर के सगे मामा का इंतकाल हो चुका है और उनके चेहलुम (तीसवें दिन की रस्म) में शामिल होना उमर के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, याचिका का दूसरा और सबसे बड़ा आधार उमर खालिद की मां की खराब सेहत को बनाया गया था। कोर्ट को बताया गया कि उनकी मां काफी समय से बीमार हैं और उन्हें एक सर्जरी (surgery) से गुजरना है।

उमर खालिद के वकील ने अदालत कक्ष में दलील देते हुए कहा कि उमर के परिवार में उनके बुजुर्ग पिता, मां और पांच बहनें हैं। उनके पिता की उम्र अब 71 साल हो चुकी है और इस उम्र में वे खुद इतने लाचार हैं कि अपनी बीमार पत्नी की ठीक से तीमारदारी या देखभाल (caregiving) नहीं कर सकते। वकीलों ने यह भी तर्क दिया कि उमर की पांच बहनों में से चार की शादी हो चुकी है और वे अपने-अपने परिवारों के साथ देश के अलग-अलग कोनों में रहती हैं। ऐसे में घर का सबसे बड़ा और इकलौता बेटा होने के नाते उमर खालिद का यह फर्ज बनता है कि वह अपनी मां के इस मुश्किल वक्त में, यानी उनके ऑपरेशन से पहले और ऑपरेशन के बाद अस्पताल और घर पर मौजूद रहे।

 बचाव पक्ष की 'समानता का अधिकार' वाली दलील

अदालत के भीतर बचाव पक्ष ने उमर खालिद का पुराना रिकॉर्ड भी जजों के सामने रखा। उन्होंने कहा कि उमर खालिद को पूर्व में भी कुछ खास मौकों पर अदालत की तरफ से अंतरिम राहत (interim relief) मिल चुकी है। जब भी वे जेल से बाहर गए, उन्होंने अदालत द्वारा तय की गई एक-एक शर्त का पूरी ईमानदारी से पालन किया और दी गई म्याद खत्म होते ही जेल प्रशासन के सामने आत्मसमर्पण (surrender) कर दिया। इतना ही नहीं, उमर के वकीलों ने इस मामले में सह-आरोपियों का हवाला देते हुए 'समानता का सिद्धांत' लागू करने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि इसी दिल्ली दंगा साजिश (Delhi riots conspiracy) मामले के अन्य सह-आरोपी तस्लीम अहमद, शिफा उर रहमान और अथर खान को भी समय-समय पर उनके पारिवारिक संकटों और बीमारी के आधार पर कोर्ट से अंतरिम राहत मिल चुकी है। इसलिए, कानून की नजर में समानता बरतते हुए उमर खालिद को भी अपनी बीमार मां की सेवा के लिए 15 दिनों की मोहलत मिलनी ही चाहिए।

 सरकारी वकील के तीखे तेवर: "नरमी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं आरोपी"

जैसे ही बचाव पक्ष ने अपनी दलीलें खत्म कीं, दिल्ली पुलिस और अभियोजन पक्ष की तरफ से पेश हुए विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) ने इस जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया। सरकारी वकील ने अदालत के सामने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि आरोपी बार-बार कानून और अदालत की नरमी का गलत फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि पहले जिन हालातों में उमर को जमानत मिली थी, वे पूरी तरह अलग थे, लेकिन इस बार जो वजहें बताई गई हैं, उनमें रत्ती भर भी गंभीरता नहीं है। अभियोजन पक्ष ने उमर खालिद के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि किसी मामा का चेहलुम कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं है, जिसमें मुख्य आरोपी की मौजूदगी अनिवार्य हो। मामा कानूनी रूप से 'कबीले या बेहद करीबी परिवार' (immediate family) के दायरे में नहीं आते और उनके बिना भी यह धार्मिक रस्म पूरी की जा सकती है। परिवार के बाकी लोग भी इसे संभाल सकते हैं।

वहीं, मां की बीमारी और ऑपरेशन के दावों पर सरकारी वकील ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया कि यह कोई जीवन-मरण से जुड़ी गंभीर सर्जरी (surgery) नहीं है। यह एक बेहद सामान्य और छोटी सी शल्य चिकित्सा है, जिसमें मरीज को बेहोश करने के लिए सिर्फ लोकल एनेस्थीसिया (local anesthesia) दिया जाना है। इसके लिए किसी को 15 दिन की जमानत देकर जेल से बाहर भेजने का कोई तुक नहीं बनता। घर में पिता और अन्य सदस्य इस सामान्य देखभाल के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।

 अदालत का वह हंटर, जिसने तोड़ दी उमर की उम्मीदें

कड़कड़डूमा कोर्ट के जज ने दोनों पक्षों की मैराथन दलीलों को बेहद गहराई से सुना और मामले से जुड़े सभी कानूनी दस्तावेजों और केस डायरी का बार-बारी से अवलोकन (scrutiny) किया। इसके बाद कोर्ट ने जो टिप्पणी की, उसने उमर खालिद के खेमे में मायूसी ला दी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना कि यह सच है कि अतीत में उमर खालिद और इस केस के अन्य सह-आरोपियों को अदालतों से अंतरिम राहतें मिली हैं और उन्होंने जेल नियमों या जमानत की शर्तों का उल्लंघन भी नहीं किया है। लेकिन, कोर्ट ने कड़े लहजे में कहा, "इसका मतलब यह कतई नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी जब भी और जिस भी आधार पर अदालत का दरवाजा खटखटाएगा, उसे हर बार आंख मूंदकर जमानत दे दी जाएगी।"

न्यायाधीश ने कहा कि कानून का नियम यह कहता है कि हर नई याचिका को उसके अपने तथ्यों, नई परिस्थितियों और पेश किए गए कारणों की गंभीरता के आधार पर ही परखा जाना चाहिए। अदालत किसी को राहत तभी दे सकती है जब उसके पीछे का कारण बेहद ठोस, अपरिहार्य और न्यायसंगत हो। उमर खालिद द्वारा अपनी मां की मामूली सर्जरी (surgery) और मामा के चेहलुम को आधार बनाकर मांगी गई यह राहत किसी भी तरह से कानूनन अनिवार्य नहीं लगती। इन टिप्पणियों के साथ, अदालत ने उमर खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका को पूरी तरह से खारिज (dismissed) कर दिया। इस फैसले से एक बार फिर साफ हो गया है कि दिल्ली दंगा साजिश (Delhi riots conspiracy) जैसे गंभीर मामलों में अदालतों का रुख बेहद सख्त है।

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