नई दिल्ली: अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने देश में मुसलमानों के सामाजिक और राजनीतिक हाशिए पर जाने, मस्जिदों और मदरसों के खिलाफ कथित कार्रवाई तथा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से जुड़े मुद्दों को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया है। बोर्ड की कार्यकारी समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया, जिसमें विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।
बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में कहा गया कि देश में बढ़ती सांप्रदायिकता, सामाजिक ध्रुवीकरण और धार्मिक संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर समुदाय के भीतर चिंता का माहौल है। समिति ने आरोप लगाया कि मुसलमानों के जीवन, संपत्ति, सम्मान और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर लगातार चुनौतियां सामने आ रही हैं, जिनके खिलाफ लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आवाज उठाई जाएगी।
बैठक में निर्णय लिया गया कि लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव में विश्वास रखने वाले विभिन्न वर्गों के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए एक विशेष कार्य समिति का गठन किया जाएगा। यह समिति विभिन्न सामाजिक संगठनों, नागरिक समूहों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ मिलकर जनजागरण अभियान चलाएगी। बोर्ड का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य समाज में बढ़ती घृणा और वैमनस्य की राजनीति के खिलाफ जनमत तैयार करना है।
कार्यकारी समिति ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। बोर्ड का मत है कि यूसीसी का अनिवार्य कार्यान्वयन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत हो सकता है। समिति ने कहा कि विभिन्न धार्मिक समुदायों की व्यक्तिगत आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बैठक में यह भी चर्चा हुई कि उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब असम, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी यूसीसी लागू करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। बोर्ड ने कहा कि वह इन प्रयासों पर नजर बनाए हुए है और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कदम उठाएगा। समिति ने याद दिलाया कि उत्तराखंड सरकार के यूसीसी कानून को पहले ही नैनीताल उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है और अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार के कानूनों के खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार किया जाएगा।
इसके अलावा बैठक में वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाए जाने के प्रयासों पर भी चर्चा की गई। बोर्ड का कहना है कि किसी भी धार्मिक या शैक्षणिक संस्था में इसे अनिवार्य करना संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। समिति ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र सरकार या कोई राज्य सरकार सभी नागरिकों अथवा विद्यार्थियों के लिए वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने का कदम उठाती है, तो इसके खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
बैठक के अंत में बोर्ड ने मुस्लिम समुदाय से अपील की कि वे अपने धार्मिक विश्वासों और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध रहें तथा किसी भी प्रकार के दबाव या विवाद के बीच संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से अपने अधिकारों की रक्षा करें। साथ ही संगठन ने यह भी कहा कि उसका प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी आंदोलन पूरी तरह लोकतांत्रिक और कानूनी दायरे में रहकर संचालित किया जाएगा। इस घोषणा के बाद यूसीसी, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस और तेज होने की संभावना है।
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