नई दिल्ली: भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में शुक्रवार का दिन बेहद गहमागहमी भरा रहा। लोकसभा में बहुप्रतीक्षित 131वां संविधान संशोधन विधेयक (131st Constitutional Amendment Bill) विशेष बहुमत न मिल पाने के कारण गिर गया। सदन में सरकार के पास जादुई आंकड़ा तो था, लेकिन संविधान संशोधन के लिए अनिवार्य दो-तिहाई समर्थन जुटाने में सत्ता पक्ष विफल रहा। इस विधायी हार के तुरंत बाद विपक्ष ने इसे संविधान की रक्षा और सरकार की 'तानाशाही' नीतियों की हार करार दिया है।
सदन में जब इस विधेयक पर वोटिंग हुई, तो पक्ष में 298 मत पड़े, जबकि विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए इसके खिलाफ 230 वोट डाले। संविधान के अनुच्छेद 368 (Article 368) की शर्तों के मुताबिक, किसी भी संशोधन बिल को पास करने के लिए उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य है। आंकड़ों की इस कमी ने सरकार की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सदन की कार्यवाही के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) राहुल गांधी ने मीडिया से बात करते हुए तीखे तेवर दिखाए। उन्होंने दो टूक कहा कि यह बिल महिला सशक्तिकरण के लिए नहीं, बल्कि भारत के बुनियादी राजनीतिक ढांचे (Political Structure) को तहस-नहस करने की एक साजिश थी।
"उन्होंने महिलाओं के नाम पर संविधान को तोड़ने के लिए असंवैधानिक हथकंडों का सहारा लिया। लेकिन भारत ने यह सच देख लिया और 'इंडिया' गठबंधन ने इसे रोक दिया। जय संविधान!"
राहुल ने प्रधानमंत्री से मांग की कि साल 2023 के मूल महिला आरक्षण बिल को बिना किसी शर्त के लागू किया जाए, जिसका पूरा विपक्ष बिना शर्त समर्थन करेगा।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस परिणाम को लोकतंत्र की जीत (Victory of Democracy) बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसे परिसीमन (Delimitation) और पुरानी जनगणना से जोड़ने के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि ओबीसी वर्ग की अनदेखी कर बनाया गया कोई भी कानून समावेशी नहीं हो सकता।
वहीं, दक्षिण भारत से भी तीखी प्रतिक्रिया आई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (MK Stalin) ने इसे दिल्ली के 'अहंकार' की हार बताया। उन्होंने अपने बयान में कहा कि तमिलनाडु ने दिल्ली की सत्ता को आईना दिखा दिया है और आने वाले समय में जनता इस घमंड को पूरी तरह चकनाचूर कर देगी। विधेयक के गिरने के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवैधानिक मर्यादा (Constitutional Propriety) और आरक्षण के मुद्दे पर आर-पार की जंग और तेज होगी।
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