MK Global Financial Services Report: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 3 से 5 जून के बीच होने वाली बैठक से पहले एक अहम रिपोर्ट ने बाजार और आम उपभोक्ताओं को राहत की उम्मीद दी है। एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई आने वाली कुछ तिमाहियों तक रेपो रेट को स्थिर रख सकता है। यदि ऐसा होता है तो होम लोन, ऑटो लोन और अन्य खुदरा ऋणों की ईएमआई पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा और उपभोक्ता खर्च को भी समर्थन मिलेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और महंगाई को लेकर बढ़ती चिंताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। ऐसे में केंद्रीय बैंक फिलहाल ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की बैठक हर बार निवेशकों, बैंकों और उद्योग जगत के लिए महत्वपूर्ण होती है। इस बार भी बाजार की नजरें रेपो रेट को लेकर केंद्रीय बैंक के फैसले पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्याज दरें स्थिर रहती हैं तो यह उपभोग आधारित आर्थिक गतिविधियों और आय चक्र को मजबूती प्रदान करेगा। स्थिर ब्याज दरों का सीधा लाभ उन लाखों लोगों को मिलेगा जो होम लोन या अन्य ऋणों का भुगतान कर रहे हैं।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों ने वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित किया है। इसके चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। तेल की कीमतों में नरमी आने से भारत के बाहरी खाते (एक्सटर्नल अकाउंट) की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में कमी से आयात बिल घटता है और चालू खाते पर दबाव कम होता है।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि हॉर्मुज स्ट्रेट के सामान्य रूप से संचालित होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 75 से 80 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में स्थिर हो सकती हैं। इससे भारतीय रुपए को मजबूती मिलने की संभावना है। मजबूत रुपया आयात लागत को कम करता है और महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करता है। यही कारण है कि तेल बाजार में स्थिरता आरबीआई को भी ब्याज दरें लंबे समय तक अपरिवर्तित रखने का अवसर दे सकती है।
हालांकि रिपोर्ट ने कुछ जोखिमों की ओर भी संकेत किया है। यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। महंगाई में वृद्धि होने पर केंद्रीय बैंक को अपनी मौद्रिक नीति को लेकर अधिक सतर्क रहना पड़ सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति आरबीआई के निर्णयों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई द्वारा रुपए-डॉलर स्वैप के माध्यम से 5 अरब डॉलर की लिक्विडिटी उपलब्ध कराए जाने के बाद बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त नकदी की स्थिति कुछ कम हुई है। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि लिक्विडिटी तरलता को लेकर किसी तत्काल संकट की आशंका नहीं है। कच्चे तेल और मुद्रा बाजार पर दबाव कम होने के बाद आरबीआई जरूरत पड़ने पर फिर से पर्याप्त तरलता सुनिश्चित कर सकता है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बैंकिंग प्रणाली में जमा वृद्धि 12.2 प्रतिशत की वार्षिक दर से बनी हुई है, जो स्वस्थ संकेत माना जा सकता है। हालांकि यह वृद्धि अभी भी ऋण विस्तार की गति के साथ पूरी तरह तालमेल नहीं बैठा पा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जमा वृद्धि और मजबूत होती है तो बैंकों की ऋण देने की क्षमता में और सुधार होगा, जिससे आर्थिक गतिविधियों को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है।
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