Water Conservation Campaign 2026 : सरकारी नौटंकी या जल संरक्षण? 'वंदे गंगा' अभियान में जनता गायब, शाहपुरा के अफसरों ने फाइलों में बहाया पानी!

खबर सार :-
Water Conservation Campaign 2026 : शाहपुरा में 'वंदे गंगा जल संरक्षण-जन अभियान 2026' प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया है। जनता और मीडिया को दूर रखकर अधिकारियों ने बंद कमरों और बांधों पर सिर्फ फोटो खिंचवाने की औपचारिकता निभाई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी रोष है, जिसकी शिकायत अब राज्य सरकार तक पहुंच चुकी है।
Water Conservation Campaign 2026 : सरकारी नौटंकी या जल संरक्षण? 'वंदे गंगा' अभियान में जनता गायब, शाहपुरा के अफसरों ने फाइलों में बहाया पानी!
खबर विस्तार : -

भीलवाड़ा: राजस्थान के शाहपुरा में इन दिनों सरकार का महत्वाकांक्षी अभियान "वंदे गंगा जल संरक्षण-जन अभियान 2026" (Water Conservation Campaign 2026) आम जनता के बीच चर्चा का विषय तो बना हुआ है, लेकिन इस चर्चा की वजह बेहद शर्मनाक है। ग्राउंड जीरो से आ रही खबरें बताती हैं कि जमीनी स्तर पर जल की एक बूंद बचाने का प्रयास भले ही न दिख रहा हो, लेकिन कागजों के भीतर विकास की पूरी गंगा बहा दी गई है। प्रदेश सरकार ने जिस मकसद के साथ इस बड़े अभियान की रूपरेखा तैयार की थी, शाहपुरा के प्रशासनिक अमले ने अहंकार और लापरवाही के चलते उस पूरी योजना का जनाजा निकाल कर रख दिया है। हालत यह है कि जल बचाने निकले अधिकारी जनता को सूचना देना ही भूल गए, या यूं कहें कि उन्होंने पूरी सूचना को ही नाले में बहा दिया।

गंगा दशहरा पर हुआ था कागजी शंखनाद

राजस्थान सरकार ने इस वर्ष गंगा दशहरा के पावन पर्व पर एक बेहद पवित्र और दूरदर्शी सोच के साथ इस महाअभियान की नींव रखी थी। सरकार का मुख्य उद्देश्य था कि गिरते भूजल स्तर को थामा जाए, पुराने कुएं-बावड़ियों का जीर्णोद्धार हो, और तालाबों को नया जीवन मिले। मुख्यमंत्री से लेकर विभागीय मंत्रियों की मंशा साफ थी कि यह पूरा कार्यक्रम सरकारी फाइलों के बंद कमरों से बाहर निकलकर एक जन आंदोलन का रूप ले। इसमें समाज के हर वर्ग, जैसे स्थानीय किसान, पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक संगठन, महिलाएं, युवा और मीडिया जगत को एक साथ जोड़कर Water Conservation Campaign 2026 को सफल बनाना था। परंतु शाहपुरा बैठ अधिकारियों ने इस "जन अभियान" को "निजी विज्ञापन" में तब्दील कर दिया।

उम्मेदसागर बांध पर सिर्फ अफसरों का मेला, जनता नदारद

विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस अभियान का आगाज शाहपुरा के ऐतिहासिक उम्मेदसागर बांध पर बेहद ठाठ-बाठ के साथ किया गया। तय समय पर साहबों की चमचमाती सरकारी गाड़ियां पहुंचीं, टेंट लगे, शानदार कुर्सियां सजीं, कुछ रटे-रटाए भाषण हुए और फिर शुरू हुआ असली खेल—'फोटोबाजी'। अधिकारियों ने चमचमाते फावड़ों के साथ कैमरे के सामने तरह-तरह के पोज दिए ताकि सरकारी वेबसाइट और उच्च अधिकारियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर तस्वीरें भेजकर अपनी पीठ थपथपाई जा सके। लेकिन इस पूरे तमाशे के बीच एक सबसे बड़ी कमी रह गई, और वह कमी थी खुद जनता की। इस Water Conservation Campaign 2026 के उद्घाटन समारोह में आम नागरिकों की उपस्थिति शून्य के बराबर थी।

सच्चे रखवालों को रखा दूर, मीडिया से भी परहेज

हैरानी की बात तो यह है कि शाहपुरा क्षेत्र में जो सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी पिछले कई दशकों से बिना किसी सरकारी मदद के तालाबों की पाल बचाने, वर्षाजल को सहेजने और सूखी नाड़ियों को पुनर्जीवित करने के काम में जुटे हैं, उन्हें इस कार्यक्रम की भनक तक नहीं लगने दी गई। उम्मेदसागर बांध के पानी के प्रबंधन को देखने वाली 'जल उपयोक्ता संगम' के सम्मानित सदस्यों तक को न्योता नहीं दिया गया। मानो अधिकारी यह डर रहे थे कि अगर जमीन से जुड़े असली लोग वहां आ गए, तो वे कागजी दावों की पोल खोल देंगे। हद तो तब हो गई जब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को भी इस पूरे आयोजन से पूरी तरह महरूम रखा गया। पत्रकारों को सूचना न देना इस बात का साफ संकेत है कि अधिकारी बंद दरवाजों के पीछे सिर्फ कागजी कोरम पूरा करना चाहते थे।

शुरू होते ही हांफने लगा अभियान, धरातल पर सन्नाटा

यह पूरा अभियान आगामी 5 जून यानी विश्व पर्यावरण दिवस तक चलना प्रस्तावित है। लेकिन शाहपुरा में उद्घाटन के दूसरे ही दिन Water Conservation Campaign 2026 की रफ्तार ऐसी सुस्त पड़ गई जैसे भीषण गर्मी के थपेड़ों में किसी छोटे गड्ढे का पानी सूख जाता है। विभागीय अधिकारियों के पास आगे के कार्यक्रमों की कोई स्पष्ट रूपरेखा या कार्ययोजना नहीं है। सरकारी आदेशों के पुलिंदों में नुक्कड़ नाटक, प्रभात फेरी, कलश यात्राएं और भव्य रैलियों के नाम पर बजट का प्रावधान तो बखूबी चमक रहा है, लेकिन हकीकत में शाहपुरा की धरती पर चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है। स्थानीय नागरिक अब तंज कसते हुए कह रहे हैं कि यहाँ पानी बचाने से ज्यादा जोर "सूचना को छिपाकर रखने" पर दिया जा रहा है।

अहंकार और डर के साये में फंसा तंत्र

अब शाहपुरा की जागरूक जनता यह तीखा सवाल पूछ रही है कि आखिर प्रशासन को किस बात का खौफ था? क्या अधिकारियों को डर था कि पर्यावरण प्रेमी आकर उनसे बजट का हिसाब मांग लेंगे? क्या उन्हें यह डर सता रहा था कि मीडिया के कैमरे उम्मेदसागर बांध की वास्तविक दुर्दशा की तस्वीरें जनता के सामने ला देंगे? सच जो भी हो, लेकिन इस रवैये ने यह साबित कर दिया है कि जब तक प्रशासनिक तंत्र अपने अहंकार को छोड़कर आम जनमानस को गले नहीं लगाएगा, तब तक कोई भी Water Conservation Campaign 2026 कभी कामयाब नहीं हो सकता। जल संरक्षण कोई एक दिन की छुट्टी मनाने या पिकनिक करने का जरिया नहीं है, यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की लड़ाई है।

सरकार के दरबार में पहुंची शिकायत, कार्रवाई का इंतजार

शाहपुरा में सरकारी तंत्र की इस घोर औपचारिकता और मनमानी से आहत होकर क्षेत्र के कई प्रमुख सामाजिक संगठनों और जल संरक्षण कार्यकर्ताओं ने अपनी लिखित पीड़ा सीधे राज्य सरकार और संबंधित विभाग के उच्च मंत्रियों तक पहुंचा दी है। अब देखना यह होगा कि जयपुर में बैठे आला अफसर इस जमीनी रिपोर्ट का संज्ञान लेकर लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाते हैं, या फिर हमेशा की तरह "सब कुछ ठीक है" का राग अलापने वाली झूठी विभागीय रिपोर्टों पर विश्वास करके फाइलों को दोबारा दबा दिया जाता है। फिलहाल, शाहपुरा की फिजाओं में सिर्फ एक ही चर्चा आम है कि साहब लोग पानी बचाने का नाटक करने तो निकले थे, लेकिन उन्होंने सबसे पहले जनभागीदारी के स्रोत को ही सुखा दिया।

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