गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग तेज, इकबाल अंसारी ने कहा- ‘गौ सम्मान देश की संस्कृति का हिस्सा’
खबर सार :-
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग एक बार फिर चर्चा में है। इकबाल अंसारी और संत समाज के बयानों ने इस मुद्दे को सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बना दिया है। जहां एक ओर गाय संरक्षण और सम्मान की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सौहार्द और कानून पालन पर भी जोर दिया जा रहा है। अब नजर केंद्र सरकार के रुख पर टिकी है।
खबर विस्तार : -
Cow National Animal demand: अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले के पूर्व वादी इकबाल अंसारी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने की मांग का समर्थन करते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि गाय केवल हिंदू आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सामाजिक सौहार्द का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। अंसारी ने जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की गई थी।
‘गाय का सम्मान पूरे देश की जिम्मेदारी’
इकबाल अंसारी ने कहा कि भारत में गाय का सम्मान हर धर्म और समुदाय के लोगों को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में गाय को ‘गौ माता’ कहा जाता है और उसे मां का दर्जा दिया गया है। ऐसे में मुस्लिम समाज का भी कर्तव्य बनता है कि वह इस भावना का आदर करे। ध्यान रहे कि अगर हमारा हिंदू पड़ोसी गाय को गौ माता कहता है तो हमें भी उसका सम्मान करना चाहिए। देश की एकता और भाईचारे के लिए यह जरूरी है कि सभी समुदाय एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं को समझें।
‘अल्लाह और पैगंबर ने गाय की कुर्बानी से रोका’
इकबाल अंसारी ने गाय की कुर्बानी के मुद्दे पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि इस्लाम में गाय की कुर्बानी को लेकर किसी तरह का अनिवार्य नियम नहीं है। उनके अनुसार अल्लाह और पैगंबर ने भी गाय की कुर्बानी से बचने की बात कही है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में इंसानियत, करुणा और दूसरे धर्मों की भावनाओं के सम्मान को महत्व दिया गया है। अंसारी ने कहा कि गाय का दूध लाभकारी माना गया है और घी को दवा के रूप में देखा जाता है। इसलिए समाज को गाय के संरक्षण और सेवा की दिशा में आगे आना चाहिए।
बकरीद से पहले शांति और सौहार्द की अपील
आगामी बकरीद पर्व को लेकर इकबाल अंसारी ने लोगों से संयम और कानून का पालन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जिन पशुओं की कुर्बानी पर प्रतिबंध है, उनकी कुर्बानी नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि त्योहारों के दौरान सामाजिक सौहार्द बनाए रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। अंसारी ने प्रशासन और समाज दोनों से मिलकर शांति और भाईचारे का वातावरण बनाए रखने की अपील की।
‘गर्मी में गायों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था हो’
इकबाल अंसारी ने केवल धार्मिक पहलू ही नहीं बल्कि पशु संरक्षण को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भीषण गर्मी के मौसम में गायों के लिए चारा और पानी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने सरकार और सामाजिक संगठनों से अपील की कि बेसहारा और सड़कों पर घूमने वाली गायों की देखभाल के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं। उनके अनुसार गाय की सेवा केवल धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि मानवीय दायित्व भी है।
आर्य संत वरुण दास महाराज ने किया समर्थन
इस मुद्दे पर आर्य संत वरुण दास महाराज ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मुस्लिम समाज द्वारा गाय संरक्षण की मांग का समर्थन करना स्वागतयोग्य कदम है। उन्होंने कहा कि भारत के मुसलमानों को आगे बढ़कर गाय संरक्षण के अभियान में भाग लेना चाहिए। वरुण दास महाराज ने कहा कि भारत की संस्कृति में गाय का विशेष स्थान रहा है और इसे केवल धार्मिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है। उन्होंने कहा कि गाय को विश्व माता का दर्जा दिया गया है और भारतीय परंपरा में उसका स्थान सर्वोच्च माना जाता है।
1857 की क्रांति से जोड़ा गाय का संदर्भ
वरुण दास महाराज ने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि 1857 की क्रांति में भी गाय की अहम भूमिका रही थी। उन्होंने बताया कि जब सैनिकों को यह जानकारी मिली कि कारतूसों पर गाय और सुअर की चर्बी का इस्तेमाल किया जा रहा है, तब पूरे देश में विरोध की लहर उठी थी। उनके अनुसार यह घटना भारतीय समाज में गाय के प्रति गहरी आस्था और संवेदनशीलता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय को पृथ्वी का स्वरूप माना गया है और धर्मग्रंथों में उसका विशेष महत्व बताया गया है।
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