इतिहास सतत और नवाचार का विषय: डॉ. बालमुकुंद पांडे
खबर सार :-
भारतीय इतिहास संकलन योजना (दिल्ली प्रांत) एवं माधव सेवा न्यास के संयुक्त तत्वावधान में रविवार, को "पूरा नवम भवति" विषय पर एक विशेष व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन किया गया।
खबर विस्तार : -
नई दिल्ली: अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के तत्वावधान में रविवार को केशवकुंज स्थित सभागार में “पूरा नवम भवति” विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय इतिहास संकलन योजना, दिल्ली प्रांत और माधव सेवा न्यास के संयुक्त सहयोग से किया गया, जिसमें इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर गहन विमर्श हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत विषय प्रवर्तन से हुई, जिसे अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के लेखक परिषद सदस्य डॉ. नरेंद्र शुक्ला ने प्रस्तुत किया। उन्होंने विषय की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए भारतीय इतिहास की व्यापकता और उसके बहुआयामी स्वरूप को रेखांकित किया।
व्याख्यानमाला की मुख्य वक्ता आचार्य (डॉ.) सुष्मिता पांडे रहीं, जो प्रमुख महिला इतिहासकार परिषद, नई दिल्ली से संबद्ध हैं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भारत विश्व की एक महान सांस्कृतिक परंपरा वाला राष्ट्र है, जहां राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की अवधारणा सदैव सशक्त रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों और विचारधाराओं का समन्वित प्रतिबिंब है।
उन्होंने प्राचीन भारत को ऋषि-मुनियों और तपस्वियों की पावन कर्मभूमि बताते हुए कहा कि यहां सभ्यता के आरंभ से ही विद्वानों, विचारकों और समाज वैज्ञानिकों ने ज्ञान की समृद्ध परंपरा विकसित की। उन्होंने चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय इतिहास में जीवन के इन मूलभूत सिद्धांतों पर गंभीर चिंतन किया गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारतीयता और राष्ट्रबोध पर आधारित इतिहास लेखन आज भी प्रासंगिक है और इस दिशा में कार्य जारी है।
कार्यक्रम में मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित डॉ. बालमुकुंद पांडे, जो संगठन के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं, ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें नवाचार की निरंतर आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य प्रारंभ हो चुका है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने की जरूरत है।
डॉ. पांडे ने कहा कि अतीत में कुछ आक्रांताओं और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को क्षति पहुंची। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है कि सत्य आधारित, समग्र और राष्ट्रबोध से प्रेरित इतिहास को पुनः स्थापित किया जाए। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे इस दिशा में मानसिक और वैचारिक रूप से तैयार हों।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना ने की। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास सत्य, ज्ञान और नवाचार पर आधारित है और इसका पुनर्लेखन भारतीयता की मूल भावना को सामने लाने के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. निर्मल पांडेय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से जुड़े डॉ. अश्मित शर्मा ने किया। इस अवसर पर प्रोफेसर शिवकुमार मिश्र, प्रोफेसर अनुराग मिश्रा, प्रोफेसर दुबे, डॉ. पीयूष मिश्रा, डॉ. उमेश कदम, डॉ. रश्मि मिश्रा और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
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