त्र्यंबकेश्वर मंदिर-कुशावर्त कुंड के पास है आत्माओं का समाधान

खबर सार :-

नासिक, महाराष्ट्र के नासिक से 28 किलोमीटर की दूरी पर सह्याद्रि पर्वतमाला और ब्रह्मगिरी की तलहटी में स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर की आस्था इसके प्रति अपना विश्वास है।
त्र्यंबकेश्वर: कुशावर्त कुंड में स्नान से मिलती है पितृ दोष से मुक्ति

खबर विस्तार : -

नासिक: भारत में पूर्वजों के प्रति सम्मान सदैव से चला आ रहा है। उनके ऋण से मुक्त होने की लालसा भी हमेशा और हर किसी में रहती है। हर कोई चाहता है कि किसी ऐसे पवित्र तीर्थ स्थान पर जाकर पितृ दोष शांति, तर्पण और अकाल मृत्यु को प्राप्त आत्माओं की मुक्ति के लिए प्रयत्न व अनुष्ठान किए जाएं। ऐसे में पूरे भारत ही नहीं, यह दुनिया का अकेला स्थान त्र्यंबकेश्वर नाम से जाना जाता है। यहां एक मंदिर है। 

18वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण कराया था

इसका इतिहास में भी बड़ा महत्व है। इसके स्थापत्य और महत्व का अध्ययन है कि अन्य तीर्थों से यह खुद को अलग करता है। इस मंदिर को 18वीं शताब्दी में बनवाया गया था। यह आज भी तीसरे मराठा पेशवा नानासाहेब (बालाजी बाजीराव) की याद करवाता है। उन्होंने इसको काले बेसाल्ट पत्थर से बनवाया और उत्कृष्ट इमारत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इसे हेमाडपंथी वास्तुकला शैली का अप्रतिम उदाहरण माना गया है। इसका इतिहास इसके प्रति आस्था और विश्वास कम नहीं हो सकती। 

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12 ज्योतिर्लिंग में माना जाता है सबसे श्रेष्ठ

बताते हैं कि हमारे देश भारत में 12 ज्योतिर्लिंग है। उनमें यह सबसे अलग है। इसकी भिन्नता के कई कारण बताए गए हैं। इनमें भी केवल यहीं पर भगवान शिव के लिंग रूप के भीतर एक छोटे से गड्ढे में त्रिदेव, ब्रह्मा (सृजनकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) तीन अंगूठे के आकार के मुख के रूप में एक साथ विराजमान हैं। इसकी तुलना अन्य स्थानों से भिन्न होने का कारण स्पष्ट है। विशेषज्ञ इसको अपने तरीके से बताते हैं। वह कहते हैं कि यहां त्रिदेव का एक साथ वास है। यही यहां की बड़ी खासियत है। इस स्थान को पितृ दोष शांति के लिए सर्वाधिक शक्तिशाली बनाता है। यहां आत्मा के जन्म, जीवन चक्र और मोक्ष तीनों की ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं उक्त रूपों में हैं। 

महर्षि गौतम की तपस्या यहीं हुई थी

कुछ लोग कहते हैं कि यह स्थान तर्पण और श्राद्ध कर्मों का केंद्र कुशावर्त कुंड है। त्र्यंबकेश्वर में मुक्ति के लिए यह कर्मकांड विधाएं पूरी की जाती हैं। इनकी सच्चाई जानने के लिए पौराणिक साक्ष्यों और स्कंद, पद्म तथा गरुड़ पुराण का अध्ययन किया जाना जरूरी बन जाता है। जो लोग इस स्थान के महात्म के बारे में नहीं जानते हैं, उनको शास्त्रों से जानकारी मिल सकती है। इनमें कहा गया है कि इस स्थान पर महर्षि गौतम और उनकी पत्नी अहल्या निवास करते थे। कथाओं में भी ऐसी बातें आ जाती हैं, महर्षि गौतम पर अनजाने में एक गाय की हत्या का पाप लग गया था। उन्होंने मुक्ति का मार्ग खोजा और भगवान शिव की घोर तपस्या की। 

कुंड में नहाने से कई परेशानियां दूर हो जातीं 

उनकी तपस्या पर भगवान शिव प्रसन्न हुए और अपनी जटाओं से पवित्र गंगा को प्रवाहित किया। यह गंगा दक्षिण भारत में गोदावरी के नाम से जानी जाती हैं। ऐसे दौर का भी वर्णन किया गया जिसके अनुसार, गोदावरी को एक कुंड में रोका गया। एक समय गोदावरी का प्रवाह बहुत ज्यादा था, तब महर्षि गौतम ने इसको कुश (एक प्रकार की घास) से इसके जल को एक कुंड में रोक लिया। आज यही कुंड कुशावर्त के नाम से जाना जाता है। इसके प्रति मान्यता और आस्था अपार है। कुशावर्त कुंड में स्नान और तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। 

पूर्वजों की आत्माओं की मुक्ति हर परिवार है चाहता

यह हिंदू धर्म के लोग मानते हैं। इनमें ऐसा पुत्र नहीं होगा, जो अपने पिता की मृत्यु पर उनकी आत्मा को किसी बंधन से मुक्ति नहीं चाहता है। इसीलिए इस स्थान के प्रति भाव बढ जाते हैं। पूर्वजों की असंतुष्ट या अतृप्त आत्माओं को जल, काले तिल, कुश और चावल अर्पित करके तृप्त करने की एक पवित्र वैदिक विधि कहा गया है। त्र्यंबकेश्वर में मुख्य रूप से वे अनुष्ठान किए जाते हैं, जो मानवीय जीवन में आ रही अस्पष्ट बाधाओं, वंश वृद्धि में रुकावट और अकारण मानसिक कष्टों (जिन्हें पितृ दोष माना जाता है) को दूर करते हैं। इन बातों का प्रमाण पुस्तक, ग्रंथ और मान्यताएं हैं। 17वीं सदी के प्रामाणिक ग्रंथ धर्म सिंधु में कहा गया है कि नारायण नागबलि अनुष्ठान पूरे विश्व में केवल त्र्यंबकेश्वर में ही किया जा सकता है।

कृत्रिम शरीर प्रदान कर सम्मानपूर्वक विदाई है की जाती 

इसके बारे में समझाया गया है। वर्णन है कि नारायण नागबलि एक तीन दिवसीय जटिल अनुष्ठान है। इस अनुष्ठान में नारायण बलि और नागबलि दोनों समाहित हैं। अतृप्त आत्माओं के लिए नारायण बलि अनुष्ठान किया जाता है। इन अतृप्त आत्माओं में अधूरी इच्छाएं मृत्युलोक में फंसी रहती हैं। इस प्रक्रिया में गेहूं के आटे से एक कृत्रिम शरीर (पुतला) बनाया जाता है। वैदिक मंत्रों द्वारा भटकी हुई आत्मा का आह्वान कर उसका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया जाता है। यह उनके लिए भी है, जिनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया। उनके लिए भी यह अनुष्ठान है, जिन आत्माओं को भौतिक शरीर नहीं मिला। इनको कृत्रिम शरीर प्रदान करने और सम्मानपूर्वक विदा करने की प्रथा निभाई जाती है। 

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