भीलवाड़ाः महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और कृषि विश्वविद्यालय कोटा के सहयोग से भीलवाड़ा में जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पांच दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। रीको औद्योगिक क्षेत्र स्थित आरसीएम वर्ल्ड में आयोजित इस प्रशिक्षण शिविर का आयोजन श्रीरामशांताय जैविक कृषि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, सरोज देवी फाउंडेशन, अमृता देवी पर्यावरण नागरिक संस्थान तथा फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 27 मई से 31 मई 2026 तक आयोजित होगा।
कार्यक्रम समन्वयक महेश चन्द्र नवहाल ने बताया कि प्रशिक्षण शिविर का उद्घाटन अतिथियों द्वारा तुलसी के गमले में जल अर्पित कर किया गया। उद्घाटन सत्र में प्रताप सिंह धाकड़, विमला डुकवाल, अशोक कोठारी, जसमीत सिंह संधू, गोयल ग्रामीण विकास संस्थान के निदेशक ताराचंद गोयल, आरसीएम के निदेशक तिलोकचंद छाबड़ा तथा अपना संस्थान के सचिव विनोद मेलाना सहित कई गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. प्रताप सिंह धाकड़ ने कहा कि वर्ष 1950 के दशक में देश की कृषि व्यवस्था कमजोर थी, जिसके समाधान के लिए हरित क्रांति लाई गई थी। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता ने नई समस्याओं को जन्म दिया। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की बढ़ती घटनाएं रासायनिक खेती के दुष्परिणामों की ओर संकेत करती हैं। ऐसे में गौ आधारित जैविक और प्राकृतिक खेती भविष्य के लिए सुरक्षित विकल्प बन सकती है।
इस अवसर पर महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और श्रीरामशांताय जैविक कृषि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र के बीच एक महत्वपूर्ण एमओयू पर भी हस्ताक्षर किए गए। कृषि विश्वविद्यालय कोटा की कुलपति डॉ. विमला डुकवाल ने कहा कि जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए चलाया जा रहा “सुविचार अभियान” एक सराहनीय पहल है। उन्होंने कहा कि विषयुक्त खाद्यान्न आज समाज और विशेष रूप से मातृशक्ति के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। भारतीय कृषि परंपरा में बीज उपचार, भूमि पूजन और प्रकृति के सम्मान जैसी परंपराओं को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है।
जिला कलेक्टर जसमीत सिंह संधु ने कहा कि वर्तमान समय में कृषि, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान जैविक खेती ही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भी प्राकृतिक खेती को एक बड़े मिशन के रूप में आगे बढ़ा रही है और किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
भीलवाड़ा विधायक अशोक कोठारी ने कहा कि गौ आधारित कृषि व्यवस्था किसानों को बेहतर पोषण, स्वस्थ जीवन और सकारात्मक सोच प्रदान कर सकती है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती को अपनाने और गांव-गांव तक इसके संदेश को पहुंचाने का आह्वान किया।
आरसीएम के निदेशक तिलोकचंद छाबड़ा ने कहा कि “सुविचार अभियान” के माध्यम से हर गांव तक जैविक खेती की अवधारणा पहुंचाने और किसानों से लगातार संवाद बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और किसानों को समय पर तकनीकी समाधान उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गोयल ग्रामीण विकास संस्थान के निदेशक ताराचंद गोयल ने कहा कि जैविक खेती तभी व्यापक स्तर पर सफल होगी जब इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और खेती की लागत कम होगी। उन्होंने लागत कम करने वाली तकनीकों और स्थानीय संसाधनों के अधिक उपयोग पर बल दिया।
अपना संस्थान के सचिव विनोद मेलाना ने बताया कि “सुविचार अभियान” के तहत अब तक बड़ी संख्या में किसानों को जैविक खेती से जोड़ा जा चुका है। उन्होंने जानकारी दी कि इस प्रशिक्षण शिविर में देश के 17 राज्यों से कुल 1120 किसानों ने पंजीकरण कराया है। पांच दिनों तक प्रतिभागियों को गौ आधारित प्राकृतिक खेती, जैविक खाद निर्माण, बीज उपचार, जल संरक्षण और पोषण वाटिका जैसे विषयों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
प्रशिक्षण के पहले दिन आयोजित तकनीकी सत्र में गोयल ग्रामीण विकास संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. पवन टांक ने जैविक खेती की समग्र अवधारणा पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने मिट्टी की संरचना, जल संरक्षण, बीज चयन, खेत की डिजाइन और पोषण वाटिका की योजना जैसे विषयों पर किसानों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने बताया कि यदि एक बीघा खेत को सुनियोजित तरीके से विकसित किया जाए तो पूरे परिवार के लिए वर्षभर अनाज, दाल, तेल, सब्जियां और फल उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
कार्यक्रम के दौरान जैविक खेती के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसान कार्यकर्ताओं तस्वीर देवी, कानाराम भुंवाल, राजेश कुवाड़ और राजेश जाखड़ का सम्मान भी किया गया। आयोजकों ने उम्मीद जताई कि इस प्रशिक्षण शिविर से देशभर के किसानों में प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और पर्यावरण अनुकूल खेती को नई दिशा मिलेगी।
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