CNAS Report में बड़ा खुलासा: पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर अमेरिका की चुप्पी से भारत में बढ़ी नाराजगी

खबर सार :-
भारत और अमेरिका के रिश्ते कई क्षेत्रों में मजबूत होते दिख रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और कश्मीर जैसे मुद्दे भरोसे में दरार पैदा कर रहे हैं। अगर अमेरिका भारत की सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से नहीं लेता, तो रणनीतिक साझेदारी प्रभावित हो सकती है। दोनों देशों को सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ राजनीतिक विश्वास बहाल करने पर ध्यान देना होगा।

CNAS Report में बड़ा खुलासा: पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर अमेरिका की चुप्पी से भारत में बढ़ी नाराजगी
खबर विस्तार : -

CNAS Report: भारत और अमेरिका के बीच मजबूत होते रिश्तों के बीच एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद पर अमेरिका का पर्याप्त ध्यान न देना भारत के लिए निराशा का बड़ा कारण बनता जा रहा है। यह मुद्दा दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक अविश्वास की एक बड़ी वजह बन चुका है।

अमेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट में बड़ा दावा

अमेरिकी थिंक टैंक Center for a New American Security द्वारा जारी पॉलिसी पेपर ‘Repairing the Breach: Getting America-India Ties Back on Track’ में कहा गया है कि भले ही रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग जारी है, लेकिन आतंकवाद और पाकिस्तान को लेकर मतभेद अब भी गहरे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में शुरू हुआ तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य होने में अभी समय लगेगा।

Pakistan प्रायोजित आतंकवाद बना विवाद की जड़

भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने और फंडिंग करने का आरोप लगाता रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नई दिल्ली इस बात से खासा निराश है कि अमेरिका ने The Resistance Front को आतंकवादी संगठन घोषित करने के बावजूद पाकिस्तान से जुड़े आतंक नेटवर्क पर पर्याप्त दबाव नहीं बनाया। यह स्थिति भारत की सुरक्षा चिंताओं को और गहरा करती है, खासकर ऐसे समय में जब सीमा पार आतंकवाद लगातार चुनौती बना हुआ है।

India-US Relations-Pakistan Terrorism

कश्मीर पर अमेरिकी रुख भी बना तनाव का कारण

कश्मीर को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद साफ नजर आते हैं। भारत हमेशा से इस मुद्दे को अपना आंतरिक मामला मानता है और किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को सिरे से खारिज करता रहा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर अमेरिका इस मुद्दे पर मध्यस्थता की बात करता है, तो इससे दोनों देशों के बीच विश्वास और कमजोर हो सकता है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि अमेरिका को भारत के रुख का सम्मान करते हुए इस मामले से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

 रक्षा और तकनीक में सहयोग बरकरार

तनाव के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। दोनों देशों ने हाल ही में 10 साल के रक्षा फ्रेमवर्क समझौते को आगे बढ़ाया है, जिसमें इंटेलिजेंस शेयरिंग, समुद्री सुरक्षा और रक्षा तकनीक सहयोग शामिल हैं। इसके अलावा, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है। यह साझेदारी खासतौर पर इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि दोनों देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं।

India-US Relations-CNAS report

Trade और Tariff विवाद के बाद सुधार के संकेत

बीते समय में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में भी तनाव देखने को मिला था, खासकर जब अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ लगाए थे। हालांकि, फरवरी 2026 में हुए अंतरिम ट्रेड समझौते ने हालात सुधारने का मौका दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता दोनों देशों को आर्थिक संबंधों को फिर से मजबूत करने का अवसर देता है, लेकिन इसके लिए लगातार प्रयास जरूरी होंगे।

Digital और Energy सेक्टर में नई संभावनाएं

भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर में अमेरिकी निवेश को दीर्घकालिक सहयोग के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, न्यूक्लियर एनर्जी और जरूरी मिनरल्स में भारत की भूमिका उसे एक मजबूत वैश्विक साझेदार बना सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन क्षेत्रों में सहयोग से मजबूत सप्लाई चेन विकसित की जा सकती है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद होगी।

रणनीतिक अविश्वास बना सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि, रिपोर्ट साफ तौर पर चेतावनी देती है कि जब तक राजनीतिक स्तर पर भरोसे की कमी दूर नहीं की जाती, तब तक इन सभी सकारात्मक पहलुओं का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा। काउंटरटेररिज्म सहयोग को फिर से मजबूत करने, टेरर फंडिंग पर लगाम लगाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेहतर तालमेल की जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अमेरिका-भारत संबंधों की दिशा यह तय करेगी कि क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ेगा या संतुलन बना रहेगा।

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