Modi Govt Mudra Yojana growth: केंद्र की प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधारों ने देश की अर्थव्यवस्था, खासकर ग्रामीण भारत, को नई दिशा दी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के हालिया बयानों से साफ है कि मोदी सरकार छोटे उद्यमियों और किसानों को सशक्त बनाकर समावेशी विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।
2015 में शुरू की गई मुद्रा योजना आज देश के सूक्ष्म और लघु उद्यमियों के लिए लाइफलाइन बन चुकी है। इस योजना के तहत बिना किसी गारंटी के लोन देकर स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है। योजना के तहत तीन श्रेणियां- शिशु, किशोर और तरुण-अलग-अलग स्तर के कारोबारियों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। 50 हजार रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक के लोन ने लाखों लोगों को अपना व्यवसाय शुरू करने में मदद की है। सरकार ने हाल ही में “तरुण प्लस” कैटेगरी भी जोड़ी है, जिसमें 20 लाख रुपए तक का लोन उपलब्ध है। यह उन उद्यमियों के लिए बड़ा अवसर है, जो अपने व्यवसाय का विस्तार करना चाहते हैं। 31 मार्च 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक लोन वितरित किए जा चुके हैं, जिनकी कुल राशि 32 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है। यह आंकड़ा इस योजना की व्यापक पहुंच और प्रभाव को दर्शाता है।
मुद्रा योजना का सबसे बड़ा असर महिला उद्यमिता पर पड़ा है। कुल लोन का लगभग 68 प्रतिशत महिलाओं को दिया गया है, जिससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण भी बढ़ा है। यह पहल ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।
हालांकि, योजना के तहत कुछ लोन एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) में भी बदले हैं। शिशु में 12.4%, किशोर में 9.4% और तरुण में 7.92% एनपीए दर्ज किया गया है। सरकार और बैंक इनकी वसूली के लिए सक्रिय हैं, जिससे योजना की दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहे। उल्लेखनीय है कि एमएसएमई सेक्टर का कुल एनपीए 3.6% है, जो तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति दर्शाता है।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि किसानों की आय बढ़ाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके लिए फसल विविधीकरण, एमएसपी पर खरीद और बीमा सुधार जैसे कदम उठाए गए हैं। सरकार किसानों को तंबाकू जैसी हानिकारक फसलों की जगह अधिक लाभकारी फसलों की ओर प्रोत्साहित कर रही है। हाइब्रिड मक्का, दालें, तिलहन, सब्जियां और बागवानी फसलें आय बढ़ाने के प्रमुख विकल्प बनकर उभरी हैं।
देश भर में केंद्र सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल तैयार किए गए हैं, जिसमें खेती के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और एग्रो-फॉरेस्ट्री को जोड़ा गया है। इससे किसानों को सालभर आय के कई स्रोत मिलते हैं और जोखिम भी कम होता है।
सरकार ने एमएसपी में वृद्धि कर किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित किया है। दालों जैसे तूर, मसूर और उड़द के लिए विशेष खरीद व्यवस्था लागू की गई है, जिससे किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है। रिकॉर्ड स्तर पर सरकारी खरीद ने किसानों के बीच भरोसा बढ़ाया है और उनकी आय को स्थिर किया है।
फसल बीमा योजना में किए गए सुधारों से किसानों को बड़ी राहत मिली है। अब यदि किसी किसान की फसल खराब होती है, तो उसे व्यक्तिगत स्तर पर मुआवजा मिल सकता है। इसके अलावा, 21 दिनों के भीतर भुगतान न होने पर 12% ब्याज देने का प्रावधान भी लागू किया गया है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है।
केंद्र सरकार ने कृषि योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग तेज किया है। शिकायतों की निगरानी और समाधान के लिए पोर्टल्स बनाए गए हैं, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग रही है। डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के जरिए किसानों के खातों में सीधे पैसे भेजे जा रहे हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई है।
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