माघ मेले में प्रयाग की पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत, त्रिवेणी के तट पर गंगा पूजन के साथ शुरू हुई पांच दिवसीय परिक्रमा
खबर सार :-
प्रयाग की सनातन परंपरा, आस्था व सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक पंचकोसी परिक्रमा की माघ मेला में शुरूआत हो गई। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद व श्री पंच दशनाम अखाड़ा की अगुवाई में संगम में गंगापूजन के साथ इसकी शुरूआत की गई। संगम में गंगा पूजन के साथ साधु-संतों का समूह अक्षयवट व आदि शंकर विमान मंडपम मंदिर गया। पंच कोशी परिक्रमा प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा है।
खबर विस्तार : -
प्रयागराज : प्रयाग की सनातन परंपरा, आस्था एवं सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक पंचकोसी परिक्रमा की माघ मेला में शुरुआत हो गई। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा की अगुवाई में संगम में गंगा पूजन से इसकी शुरुआत सोमवार को हुई। यह पंचकोसीय परिक्रमा पांच दिनों तक चलेगी, जिसमें आखिरी दिन साधु-संतों के लिए भंडारे का आयोजन होगा।
माघ मेला प्रशासन को इस परिक्रमा के आयोजन में यातायात व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी मिली है। संगम में गंगा पूजन के बाद साधु-संतों का समूह अक्षयवट और आदि शंकर विमान मंडपम मंदिर भी गया। इसके उपरांत पहले दिन की परिक्रमा का समापन हो गया।
प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा है पंच कोशी परिक्रमा
पंच कोशी परिक्रमा प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि का कहना है कि इस परिक्रमा की परम्परा के पीछे प्रयागराज का वह क्षेत्रीय विस्तार है जिसके अनुसार प्रयाग मंडल पांच योजन और बीस कोस में विस्तृत है। गंगा, यमुना और सरस्वती के यहां 6 तट हैं जिन्हें मिलाकर तीन अन्तर्वेदियां बनाई गई हैं।
अंतर्वेदी, मध्य वेदी और बहिर्वेदी। इन तीनों वेदियों में कई तीर्थ, उप तीर्थ और आश्रम हैं जिनकी परिक्रमा को पंचकोसी परिक्रमा के अन्दर शामिल किया गया है। प्रयाग आने वाले सभी तीर्थ यात्रियों को इसकी परिक्रमा करनी चाहिए क्योंकि इससे इनमे विराजमान सभी देवताओं, आश्रमों, मंदिरों, मठों और जलकुंडों के दर्शन से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
556 साल पहले माघ मेले का अटूट हिस्सा थी पंचकोसी परम्परा
दिव्य और भव्य माघ मेले के आयोजन में कई परम्पराएं शामिल हैं, जिनमें कल्पवास और पंचकोशी परिक्रमा भी शामिल हैं। परिक्रमा में शामिल हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी का कहना है कि पंचकोसी परम्परा आज से 556 साल पहले माघ मेले का अटूट हिस्सा थी। 556 साल पहले मुगल शासक अकबर ने इसे रोक दिया था। कई वर्षों के बाद साधु-संतों की मांग के बाद योगी सरकार की कोशिशों से पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत 2019 में हुई और अब यह परम्परा सतत चल रही है।
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