नई दिल्ली: भोलेनाथ का प्रिय श्रावण मास 11 जुलाई से शुरू हो रहा है, जिसको लेकर शिव भक्त काफी उत्साहित हैं। सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ की पूजा का विशेष महत्व है। भोलेनाथ भले ही जल और बेल पत्र से प्रसन्न हो जाते हैं, लेकिन उन्हें चढ़ाई जाने वाली कुछ पूजन सामग्रियों का अपना विशेष स्थान और महत्व है। किसी भी पूजा में 'अक्षत' यानी चावल का स्थान अमूल्य है। शास्त्रों के अनुसार अक्षत के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए भोलेनाथ ही नहीं, अपितु 33 कोटि देवी-देवताओं को भी अक्षत बहुत प्रिय है।
धर्म शास्त्रों में 'अक्षतश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्त: सुशोभित:। माया निवेदिता भक्त्या: गृहाण परमेश्वर:' श्लोक का उल्लेख मिलता है। 'अक्षत' का अर्थ है 'जो टूटा न हो', जो पवित्रता, समृद्धि और अखंडता का प्रतीक है। पुराणों में इसे 33 करोड़ देवी-देवताओं का प्रिय बताया गया है। भगवान शिव को अक्षत चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। हिंदू धर्म में अक्षत का विशेष स्थान है। देवी-देवताओं की पूजा हो या फिर त्योहार, बलि देना हो या फिर यज्ञ में तिलक लगाना हो, अक्षत के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता।
पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार अक्षत अन्न का प्रतीक है, जो जीवन का आधार है। इसे भगवान को अर्पित करने से समृद्धि, सुख और शांति की प्राप्ति होती है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि अक्षत से हवन करने से देवता प्रसन्न होते हैं और पितर भी तृप्त होते हैं। अक्षत को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि यह बिना टूटे और बिना छिलके वाला चावल होता है। तिलक, हवन और पूजा में इसका प्रयोग करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता बढ़ती है। गरुड़ पुराण के अनुसार अक्षत चढ़ाने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और यह कार्य परिवार में सौभाग्य लाता है।
अक्षत जगत के पालनहार को भी बहुत प्रिय है। शिव पुराण में बताया गया है कि भगवान शिव स्वभाव और सरलता के प्रतीक हैं। अक्षत उनकी सादगी और पवित्रता से मेल खाते हैं। शिवलिंग पर अक्षत चढ़ाने से भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इससे भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में स्थिरता आती है। अन्न जीवन का आधार है और शिव स्वयं जीवन के रक्षक हैं। यही वजह है कि भोले बाबा को अक्षत से विशेष प्रेम है। सावन में जल, दूध, बेलपत्र और अक्षत से शिव की पूजा करने से भक्तों को आत्मिक शांति और सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है।
पूजा में अक्षत का प्रयोग साफ और अखंडित चावल के रूप में करने को कहा जाता है। इसे रोली या हल्दी में मिलाकर तिलक लगाने या शिवलिंग पर चढ़ाने से विशेष फल मिलता है। सावन में शिवलिंग पर अक्षत चढ़ाना और 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है। कई प्रमुख हिंदू त्योहारों पर चावल और दूध से बनी खीर या चावल-गुड़ से बनी बखीर का भोग लगाकर प्रसाद के रूप में खाने की परंपरा है। इससे त्योहारों की शुभता और आनंद और बढ़ जाता है।
मान्यता है कि आद्रा नक्षत्र में गाय के दूध और चावल से बनी खीर का प्रसाद खाने से बरसात में जहरीले कीड़ों के काटने पर जहर का असर कम होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह नक्षत्र ज्येष्ठ माह में 15 दिनों तक रहता है और इस समय भारत में मानसून प्रवेश करता है, जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में मूसलाधार बारिश होती है। इस दौरान कीड़े पनपने लगते हैं। आद्रा नक्षत्र में खीर का प्रसाद चढ़ाने का वैज्ञानिक कारण भी है। चावल हल्का होता है। यह पाचन शक्ति को मजबूत करता है और शरीर को ऊर्जा भी देता है। बरसात का यह समय ऐसा होता है जब पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। ऐसे में चावल से बनी खीर आसानी से पच जाती है और शरीर को ऊर्जा मिलती है।
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