Delhi Court Alka Lamba : दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने अलका लांबा (Alka Lamba) को बड़ा झटका देते हुए जंतर-मंतर पर महिला आरक्षण लागू करने की मांग से जुड़े प्रदर्शन मामले में दोषी करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर सरकारी काम में बाधा, लोकसेवक के साथ धक्का-मुक्की, कानूनी आदेश की अवहेलना और सार्वजनिक रास्ता रोकने जैसे गंभीर आरोप साबित हुए हैं।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, 29 जुलाई 2024 को जंतर-मंतर पर महिला कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान निषेधाज्ञा लागू थी, बावजूद इसके लांबा और उनके समर्थकों ने आदेशों की अवहेलना करते हुए प्रदर्शन जारी रखा। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने टालस्टाय मार्ग पर लगे बैरिकेड को पार कर संसद मार्ग जाम किया और पुलिसकर्मियों से धक्का-मुक्की की, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस ने बताया कि कई बार चेतावनी देने के बावजूद प्रदर्शनकारी नहीं माने और बाद में उन्हें हटाने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा, जिसके बाद मामला एफआईआर तक पहुंचा।
20 दिसंबर 2025 को अदालत ने वीडियो साक्ष्य का अवलोकन किया, जिसमें स्पष्ट हुआ कि आरोपी ने लोकसेवक के कार्य में बाधा पहुंचाई और बैरिकेडिंग तोड़ने की घटना में सक्रिय भूमिका निभाई। यह मामला उस समय से जुड़ा है जब महिला आरक्षण विधेयक को लेकर देशभर में राजनीतिक बहस तेज थी और विभिन्न संगठनों ने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन का केंद्र बनाया था। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी माना कि प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था और निषेधाज्ञा का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है।

इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई है और कांग्रेस नेताओं ने इसे कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए विस्तृत जांच की मांग की है। वहीं पुलिस का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए बार-बार चेतावनी दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी भीड़ के रूप में आगे बढ़ते रहे। अदालत में पेश वीडियो फुटेज और गवाहों के बयान को आधार बनाकर यह निष्कर्ष निकाला गया कि आरोपों में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। मामले में बीएनएस की विभिन्न धाराएं जैसे 132, 221, 223(ए) और 285 के तहत कार्रवाई की गई है, जिनमें सरकारी कार्य में बाधा डालना और आदेशों का उल्लंघन प्रमुख आधार हैं।
Alka Lamba के समर्थकों का कहना है कि यह मामला राजनीतिक विरोध और लोकतांत्रिक प्रदर्शन के अधिकार से जुड़ा है, जिसे गलत तरीके से आपराधिक रूप दिया जा रहा है। पूरा घटनाक्रम जुलाई 2024 के प्रदर्शन से शुरू होकर अदालत में साक्ष्यों की समीक्षा और अब दोषसिद्धि तक पहुंचा है, जिसमें कई चरणों में पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया शामिल रही। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अदालतें सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाकर निर्णय देती हैं, जिससे भविष्य के प्रदर्शन नियमों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल अदालत ने दोष सिद्ध कर दिया है और अब 5 जून को सजा की बहस होगी, जिस पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं।

दरअसल, इस मामले में कोर्ट की पिछली सुनवाई में भी संकेत दिए गए थे कि वीडियो साक्ष्य और पुलिस रिपोर्ट मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिससे आरोपों की पुष्टि की दिशा मजबूत हुई। इस निर्णय को लेकर सोशल मीडिया पर भी चर्चा तेज हो गई है, जहां लोग इसे कानून व्यवस्था और विरोध प्रदर्शन की सीमाओं से जोड़कर देख रहे हैं। अब मामला सजा निर्धारण चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां अदालत सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार कर यह तय करेगी कि दोषी करार दिए जाने के बाद क्या सजा उपयुक्त होगी। इस बीच पुलिस और अभियोजन पक्ष अपने साक्ष्यों को मजबूत बताते हुए अदालत के फैसले को सही ठहरा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला आने वाले समय में महिला आरक्षण और प्रदर्शन राजनीति की बहस को और तेज कर सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत परिसर में सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाई गई थी और सुनवाई के दौरान मीडिया की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था जिससे प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से पूरी हो सके संपन्न हुई जिससे न्यायिक कार्यवाही में किसी प्रकार की बाधा नहीं आई।
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