नई दिल्ली: उत्तर भारत समेत देश के बड़े हिस्से में आसमान से आग बरस रही है। पारा 45 डिग्री के पार जाने को बेताब है और गर्म हवाओं यानी 'लू' ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। वैसे तो यह मौसम हर किसी के लिए भारी पड़ रहा है, लेकिन मेडिकल विशेषज्ञों ने एक विशेष वर्ग के लिए 'रेड अलर्ट' जारी किया है—वे हैं गर्भवती महिलाएं। चिकित्सा विज्ञान मानता है कि गर्भावस्था के दौरान शरीर का तापमान सामान्य से थोड़ा अधिक रहता है, ऐसे में बाहर की भीषण गर्मी 'दोहरी मार' की तरह काम करती है।
नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) की हालिया गाइडलाइंस और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी साफ संकेत दे रही है कि इस बार की गर्मी केवल पसीना और बेचैनी नहीं, बल्कि प्री-मैच्योर डिलीवरी और डिहाइड्रेशन जैसी गंभीर जटिलताएं भी ला सकती है। आइए समझते हैं कि इस तपती दोपहर में एक होने वाली मां खुद को और अपने गर्भ में पल रहे शिशु को कैसे सुरक्षित रख सकती है।
गर्भावस्था के दौरान शरीर में मेटाबॉलिक रेट बढ़ जाता है। डॉक्टर बताते हैं कि इस स्थिति में शरीर को खुद को ठंडा रखने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। जब बाहर का तापमान बढ़ता है, तो शरीर का यह कूलिंग सिस्टम जवाब देने लगता है। अधिक पसीना आने से शरीर में पानी और नमक (इलेक्ट्रोलाइट्स) की कमी हो जाती है, जिससे सीधे तौर पर गर्भस्थ शिशु को मिलने वाले रक्त संचार पर असर पड़ सकता है।
पत्रकारिता की भाषा में कहें तो बचाव का कोई शॉर्टकट नहीं होता। विशेषज्ञों ने कुछ बुनियादी लेकिन बेहद प्रभावी उपाय बताए हैं:
सूती लिबास: केवल फैशन नहीं, सुरक्षा भी
गर्मी में टाइट और सिंथेटिक कपड़े पहनना मुसीबत को दावत देना है। ढीले-ढाले, हल्के रंग के सूती कपड़े न केवल पसीने को सोखते हैं, बल्कि हवा के संचार को भी बनाए रखते हैं। गहरा रंग ऊष्मा (Heat) को सोखता है, इसलिए सफेद या पेस्टल रंगों का चुनाव समझदारी है।
'हाइड्रेशन' : बनाएं अपना हथियार
केवल प्यास लगने पर पानी पीना काफी नहीं है। गर्भावस्था में शरीर को 'हाइपर-हाइड्रेटेड' रहने की जरूरत होती है। सादे पानी के अलावा नारियल पानी, ताजी छाछ और बिना चीनी वाला नींबू पानी इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करते हैं। याद रखें, यदि पेशाब का रंग गहरा पीला है, तो यह खतरे की घंटी है कि आपके शरीर में पानी की भारी कमी है।
बाहर निकलने से बचें: दोपहर 12 से 4 बजे तक
सूरज की किरणें इस समय सबसे अधिक तीखी होती हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह है कि इस समयावधि में बाहर निकलने से बचें। यदि अस्पताल जाना या कोई बेहद जरूरी काम हो, तो छाता, सनग्लासेस और सिर को ढकने के लिए सूती स्कार्फ का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें।
खान-पान: हल्का और पौष्टिक
ज्यादा तेल-मसाले वाला भोजन शरीर में गर्मी पैदा करता है और पाचन तंत्र को सुस्त बनाता है। इसकी जगह ठंडी तासीर वाली चीजें जैसे तरबूज, खीरा, ककड़ी और दही को आहार में शामिल करें। एक साथ भारी भोजन करने के बजाय छोटे-छोटे अंतराल पर हल्का खाना खाएं।
अक्सर महिलाएं थकान को सामान्य समझकर टाल देती हैं। लेकिन अगर आपको अचानक चक्कर आए, धुंधला दिखाई दे, तेज सिरदर्द हो या भ्रूण की हलचल (Baby Movement) में कमी महसूस हो, तो इसे 'गर्मी का असर' कहकर घर पर न बैठें। यह हीट स्ट्रोक या प्री-एक्लेमप्सिया के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।
एक वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर समाज के इस पहलू को समझना जरूरी है कि गर्भवती महिला की सुरक्षा केवल उसकी अपनी जिम्मेदारी नहीं है। परिवार के सदस्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि घर का वातावरण ठंडा रहे। वेंटिलेशन का ध्यान रखें और महिला को मानसिक रूप से शांत और शारीरिक रूप से आरामदेह स्थिति में रखें।
तपती गर्मी और लू का यह दौर कुछ हफ्तों की बात है, लेकिन एक छोटी सी लापरवाही उम्र भर का मलाल दे सकती है। स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों की सलाह का अक्षरश: पालन करना ही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है। याद रखिए, आपकी सावधानी ही आने वाली नन्ही जान की पहली ढाल है।