भीलवाड़ाः कुंवर प्रताप सिंह बारहठ की 133वीं जयंती पर रविवार को देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया। शाहपुरा की इस वीर भूमि पर जन्मे अमर क्रांतिकारी के सम्मान में गुजरात के द्वारका जिले के खंभालिया सहित जयपुर और कैकड़ी में भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित हुए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल उनके जन्मस्थान शाहपुरा को लेकर खड़ा हो गया, जहां जयंती समारोह में केवल 18 लोगों की मौजूदगी ने समाज की संवेदनशीलता और अपने इतिहास के प्रति जुड़ाव पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
शाहपुरा की मिट्टी में इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि यहां की हवाओं और स्मृतियों में जीवित है। यही वह धरती है जिसने देश को ऐसा क्रांतिकारी दिया जिसने अपनी युवावस्था मातृभूमि के चरणों में समर्पित कर दी। शहर में उनके नाम पर त्रिमूर्ति स्मारक, राष्ट्रीय बारहठ संग्रहालय, उनकी माताजी के नाम पर बालिका विद्यालय और राजकीय पीजी कॉलेज जैसे कई स्मृति स्थल मौजूद हैं। इसके बावजूद उनकी जयंती पर आमजन की बेहद कम भागीदारी चिंता का विषय बन गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इसी स्थान पर कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम, राजनीतिक सभा या मनोरंजन आयोजन होता, तो भारी भीड़ उमड़ पड़ती। सोशल मीडिया पर तस्वीरों और वीडियो की भरमार होती। लेकिन जब बात देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीद की आती है, तब समाज की चुप्पी कई सवाल खड़े कर देती है।
सबसे अधिक पीड़ादायक बात यह रही कि बारहठ परिवार के नाम पर संचालित संस्थाओं से जुड़े कई पदाधिकारी भी कार्यक्रम में नजर नहीं आए। इसे केवल व्यक्तिगत अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उस सामाजिक भावना की कमी माना जा रहा है जो किसी समाज को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़े रखती है।
क्रांतिकारी प्रताप सिंह बारहठ का प्रसिद्ध कथन “मैं अपनी एक मां को हंसाने के लिए देश की हजारों माताओं को नहीं रुला सकता” आज भी राष्ट्रभक्ति और त्याग का सर्वोच्च संदेश माना जाता है। लेकिन उनकी जयंती पर शाहपुरा की फीकी उपस्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या नई पीढ़ी अपने इतिहास और शहीदों से दूर होती जा रही है।
शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि अब केवल औपचारिक श्रद्धांजलि से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। स्कूलों और कॉलेजों में प्रताप सिंह बारहठ के जीवन पर प्रतियोगिताएं, व्याख्यान और जनजागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि युवा पीढ़ी उनके विचारों और बलिदान से प्रेरणा ले सके।
इतिहास केवल स्मारकों से जीवित नहीं रहता, बल्कि समाज की स्मृतियों और सम्मान से जीवित रहता है। अगर कोई शहर अपने शहीदों को भुलाने लगे, तो आने वाली पीढ़ियां भी उस शहर की पहचान भूल जाती हैं। शाहपुरा को अपने इस अमर सपूत के प्रति गर्व और सम्मान को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जनभागीदारी और संस्कारों के रूप में भी दिखाना होगा।
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