अनियमित भुगतान के आरोपों से हिला HDFC बैंक, शेयरों में 2% से ज्यादा गिरावट, निवेशकों की चिंता बढ़ी

खबर सार :-
एचडीएफसी बैंक पर लगे अनियमित भुगतान और गवर्नेंस से जुड़े आरोपों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। शेयरों में आई गिरावट इस बात का संकेत है कि बाजार कॉरपोरेट पारदर्शिता को लेकर बेहद संवेदनशील है। हालांकि बैंक और आरबीआई की ओर से फिलहाल कोई गंभीर अनियमितता स्वीकार नहीं की गई है। आने वाले दिनों में जांच और आधिकारिक स्पष्टीकरण निवेशकों की धारणा तय करेंगे।
अनियमित भुगतान के आरोपों से हिला HDFC बैंक, शेयरों में 2% से ज्यादा गिरावट, निवेशकों की चिंता बढ़ी
खबर विस्तार : -

HDFC Bank payment irregularities : देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक HDFC Bank के शेयरों में बुधवार को तेज गिरावट देखने को मिली। बैंक पर अनियमित भुगतान और आंतरिक गवर्नेंस से जुड़े गंभीर आरोपों के बाद निवेशकों की चिंता बढ़ गई, जिसका असर सीधे शेयर बाजार में दिखाई दिया। कारोबार के दौरान बैंक का शेयर 2.27 प्रतिशत तक टूटकर 761.20 रुपये के दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकिंग सेक्टर में कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर उठे सवाल निवेशकों के भरोसे को प्रभावित करते हैं और यही वजह है कि रिपोर्ट सामने आने के बाद शेयरों में बिकवाली बढ़ गई।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एचडीएफसी बैंक की ऑडिट कमेटी ऑफ द बोर्ड (एसीबी) ने 12 मार्च को एक औपचारिक आंतरिक सतर्कता जांच के आदेश दिए थे। यह जांच वित्त वर्ष 2024 और 2025 के दौरान महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन यानी एमएसआरडीसी को किए गए लगभग 45 करोड़ रुपये के भुगतान से जुड़ी है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह भुगतान कथित तौर पर एमएसआरडीसी द्वारा बैंक में जमा की गई रकम पर अलग-अलग ब्याज दरों से संबंधित थे। आरोप है कि यह राशि सीधे ब्याज भुगतान के रूप में जारी करने के बजाय बैंक के मार्केटिंग विभाग के माध्यम से भेजी गई।

चार स्थानीय विक्रेताओं के जरिए भुगतान का आरोप

रिपोर्ट के मुताबिक, कथित भुगतान को सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान के खर्च के रूप में दर्शाया गया। इसके लिए चार स्थानीय विक्रेताओं का इस्तेमाल किया गया। इस खुलासे ने बैंक की आंतरिक प्रक्रियाओं और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी वित्तीय संस्थान में भुगतान प्रक्रियाओं को लेकर इस तरह की अनियमितता सामने आती है, तो उसका असर न केवल निवेशकों बल्कि नियामक संस्थाओं के भरोसे पर भी पड़ सकता है।

वरिष्ठ प्रबंधन पर भी उठे सवाल

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि इस व्यवस्था को लेकर बैंक के वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर चर्चा हुई थी। इसमें बैंक के एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन (Sashidhar Jagdishan) की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों को लेकर बैंक की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक बैंक स्पष्ट स्पष्टीकरण जारी नहीं करता, तब तक निवेशकों के बीच अनिश्चितता बनी रह सकती है।

पूर्व चेयरमैन के इस्तीफे से जुड़ा मामला

रिपोर्ट में इन घटनाक्रमों को बैंक के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष अतानु चक्रवर्ती (Atanu Chakraborty) के अचानक इस्तीफे से भी जोड़ा गया है। उन्होंने 18 मार्च को पद छोड़ते हुए मूल्यों और नैतिकता से जुड़े मतभेदों का हवाला दिया था। हालांकि बैंक प्रबंधन ने बाद में कहा था कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद उन्हें किसी विशेष चिंता के बारे में जानकारी नहीं दी गई। इसके बावजूद बाजार में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या बैंक के भीतर गवर्नेंस स्तर पर कोई गंभीर मतभेद थे।

RBI और बैंक की चुप्पी से बढ़ी अटकलें

रिपोर्ट में कहा गया कि प्रकाशन से पहले भेजे गए विस्तृत सवालों का न तो बैंक ने और न ही Reserve Bank of India (आरबीआई) ने जवाब दिया। इससे बाजार में अटकलों का दौर और तेज हो गया। हालांकि इससे पहले मार्च में आरबीआई ने बयान जारी कर कहा था कि एचडीएफसी बैंक के संचालन या आचरण को लेकर कोई महत्वपूर्ण चिंता नहीं है। इसके बावजूद ताजा आरोपों ने निवेशकों का ध्यान बैंक की आंतरिक नीतियों की ओर खींच दिया है।

केकी मिस्त्री को मिली अंतरिम जिम्मेदारी

अतानु चक्रवर्ती के इस्तीफे के बाद एचडीएफसी समूह के वरिष्ठ अधिकारी केकी मिस्त्री (Keki Mistry) को अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने कहा कि बैंक का संचालन और प्रशासन पूरी तरह स्थिर बना हुआ है और ग्राहकों या निवेशकों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा समय में बैंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती निवेशकों का भरोसा बनाए रखना और पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करना होगा।

बाजार पर असर दिखने की आशंका

एचडीएफसी बैंक भारतीय बैंकिंग सेक्टर का सबसे बड़ा निजी बैंक है और इसका असर पूरे वित्तीय बाजार पर पड़ता है। यदि आरोपों की जांच आगे बढ़ती है तो बैंकिंग सेक्टर के अन्य शेयरों पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव बन सकता है। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि जब तक किसी नियामक संस्था द्वारा औपचारिक कार्रवाई नहीं होती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव सीमित रह सकता है।

 

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